मंगलवार, 1 मई 2012

अनुभूति

जाने कौन हो तुम .
लौकिक या पारलौकिक
समूचे अस्तित्व पर छाये हो तुम
अदृश्य हो ,अचिंतन हो .
.न होते हुए भी बस हो तुम,
जाने सूर्य का तेज हो या
चंद्रमा की शीतलता,
प्रभात का कलरव हो या
रात्रि की नीरवता.
मै अधूरी हूँ तुम बिन ,
तुम अस्तित्व की अनुभूति हो
तुम मेरे अन्धकार की दीप्ति हो .....

5 टिप्‍पणियां:

  1. शब्दों का चयन खूबसूरत है ......पंक्तियाँ अच्छी लगी |

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  2. सिद्धार्थ जी ...आभार आपका ...........

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  3. बेहतरीन पंक्तिया.......लाजवाब...रचना....।

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  4. राजेन्द्र जी ..आभार आपका ...आपका ही दिया है सब ..

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